दोहा छंद कैसे लिखें
दोहा छंद कैसे लिखें? जानिए 13-11 मात्रा विधान, लघु-गुरु, यति, तुक और चरणांत के नियम तथा दोहा लेखन की पूरी विधि।
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दोहा छंद कैसे लिखें? नियम, मात्रा गणना और मौलिक उदाहरण सहित संपूर्ण मार्गदर्शिका
दोहा हिन्दी काव्य-साहित्य का अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावशाली मात्रिक छंद है। संत कबीर, रहीम, तुलसीदास और अनेक भक्तिकालीन कवियों ने दोहों के माध्यम से जीवन-दर्शन, नीति, प्रेम, भक्ति और सामाजिक चेतना को सरल शब्दों में अभिव्यक्त किया है।
दोहा आकार में छोटा होने के बावजूद अर्थ की दृष्टि से अत्यंत व्यापक होता है। इसकी विशेषता यह है कि सीमित शब्दों में गहरी अनुभूति, जीवन का अनुभव और प्रभावशाली संदेश प्रस्तुत किया जा सकता है।
लेकिन एक अच्छा दोहा लिखने के लिए केवल चार चरणों में तुकांत पंक्तियाँ लिख देना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए मात्रा-गणना, लघु-गुरु, चरण-विधान, तुक, यति और भाव-संयोजन का ज्ञान आवश्यक है।
इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि दोहा छंद क्या है, इसके नियम क्या हैं, 13–11 मात्रा की गणना कैसे की जाती है और शुद्ध एवं मौलिक दोहा लिखने का अभ्यास किस प्रकार किया जा सकता है।
दोहा छंद क्या है?
दोहा एक अर्द्धसम मात्रिक छंद है। इसमें कुल चार चरण होते हैं। प्रथम और तृतीय चरण विषम तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण सम कहलाते हैं।
दोहा का निर्धारित मात्रा-विधान इस प्रकार है:
| चरण | प्रकार | मात्राएँ |
|---|---|---|
| प्रथम | विषम | 13 |
| द्वितीय | सम | 11 |
| तृतीय | विषम | 13 |
| चतुर्थ | सम | 11 |
| कुल | 48 |
इस प्रकार दोहे की प्रत्येक पंक्ति में 24 मात्राएँ और पूरे दोहे में 48 मात्राएँ होती हैं।
दोहा छंद के प्रमुख नियम
दोहा लिखते समय निम्नलिखित नियमों का ध्यान रखना आवश्यक है।
नियम 1 — मात्रा विधान
पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होनी चाहिए।
नियम 2 — यति
प्रत्येक पंक्ति में 13वीं मात्रा के बाद यति अर्थात स्वाभाविक विराम होता है। इस प्रकार दोहे का प्रत्येक पद 13+11 मात्राओं में विभाजित होता है।
नियम 3 — विषम चरण का आरंभ
प्रथम और तृतीय चरण के आरंभ में जगण (लघु–गुरु–लघु अर्थात 1–2–1) का निषेध माना जाता है।
नियम 4 — चरणांत
पारंपरिक विधान में विषम चरणों के अंत में गुरु-लघु क्रम नहीं होना चाहिए। सम चरणों के अंत में गुरु-लघु का क्रम अपेक्षित होता है।
नियम 5 — तुक विधान
द्वितीय और चतुर्थ चरणों में सामान्यतः तुक मिलाई जाती है। इससे दोहे में ध्वनि-सौंदर्य और पूर्णता आती है।
नियम 6 — भाव की संपूर्णता
दोहा छोटा छंद है, इसलिए इसमें अनावश्यक शब्दों की गुंजाइश कम होती है। प्रत्येक शब्द का चयन अर्थ, लय और अभिव्यक्ति की दृष्टि से सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
इन नियमों का आधार पारंपरिक दोहा-विधान है।
मात्रा गणना कैसे करें?
दोहा लिखने से पहले मात्रा गणना समझना आवश्यक है। मात्रा का निर्धारण उच्चारण में लगने वाले समय के आधार पर किया जाता है।
छंदशास्त्र में मात्राओं के दो प्रमुख प्रकार हैं।
लघु मात्रा
लघु वर्ण का मान एक मात्रा होता है।
उदाहरण:
| वर्ण | मात्रा |
|---|---|
| क | 1 |
| कि | 1 |
| कु | 1 |
| ति | 1 |
| सु | 1 |
| मि | 1 |
गुरु मात्रा
गुरु वर्ण का मान दो मात्राएँ होता है।
उदाहरण:
| वर्ण | मात्रा |
|---|---|
| का | 2 |
| की | 2 |
| कू | 2 |
| के | 2 |
| को | 2 |
| कौ | 2 |
दीर्घ स्वरों के अतिरिक्त अनुस्वार, विसर्ग और संयुक्त व्यंजन से संबंधित स्थितियों में भी गुरु का निर्धारण होता है। इनकी गणना उच्चारण और छंदशास्त्रीय नियमों के अनुसार करनी चाहिए।
मात्रा गणना के संकेत
मात्राओं की गणना करते समय निम्न संकेत उपयोगी होते हैं:
- लघु = 1 मात्रा
- गुरु = 2 मात्राएँ
- 1 + 1 = 2 मात्राएँ
- 1 + 2 = 3 मात्राएँ
- 2 + 2 = 4 मात्राएँ
उदाहरण के लिए, ‘कमल’ शब्द में सामान्य गणना के अनुसार क (1), म (1), ल (1) के स्थानों पर अंतिम हलंत उच्चारण के संदर्भ को ध्यान में रखना पड़ता है। इसलिए केवल लिखित वर्ण देखकर गणना नहीं करनी चाहिए।
प्रसिद्ध दोहे की मात्रा गणना समझिए
दोहा छंद को समझने के लिए रहीम का यह प्रसिद्ध दोहा उपयोगी है:
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून॥
इसमें पहले पद के दो चरण और दूसरे पद के दो चरण हैं। प्रत्येक पद का पहला चरण 13 और दूसरा चरण 11 मात्राओं का है।
एक अन्य प्रमाणित उदाहरण माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान की कक्षा 11 की पाठ्यपुस्तक में दिया गया है:
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि।
बरनउँ रघुवर विमल जसु, जो दायक फल चारि॥
इस उदाहरण में भी 13–11, 13–11 का मात्रा-विधान और यति का प्रयोग स्पष्ट किया गया है।
मौलिक दोहा लिखने की प्रक्रिया
अब प्रश्न है कि स्वयं दोहा कैसे लिखा जाए?
इसके लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाएँ।
चरण 1 — विषय निर्धारित करें
सबसे पहले यह तय करें कि आप किस विषय पर दोहा लिखना चाहते हैं।
उदाहरण:
- जीवन और अनुभव
- माता-पिता का सम्मान
- प्रकृति संरक्षण
- शिक्षा और संस्कार
- समय का महत्त्व
- सत्य और सदाचार
- प्रेम और मानवीय संबंध
चरण 2 — मूल भाव तैयार करें
विषय चुनने के बाद उस पर अपना विचार स्पष्ट करें।
मान लीजिए विषय है—समय का महत्त्व।
मूल भाव यह हो सकता है कि बीता हुआ समय वापस नहीं आता, इसलिए वर्तमान का सदुपयोग करना चाहिए।
चरण 3 — संक्षिप्त शब्दों का चयन करें
दोहा में शब्दों की संख्या सीमित होती है। इसलिए कम शब्दों में अधिक अर्थ व्यक्त करने का प्रयास करें।
चरण 4 — चार चरणों में भाव विभाजित करें
प्रथम चरण में विचार का आरंभ, दूसरे में उसकी पूर्ति और तीसरे-चौथे में विचार का विस्तार अथवा निष्कर्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।
यह भाव-विन्यास की एक उपयोगी पद्धति है, अनिवार्य शास्त्रीय नियम नहीं।
चरण 5 — मात्रा गणना करें
अब प्रत्येक चरण की मात्राएँ अलग-अलग गिनें।
- प्रथम चरण — 13
- द्वितीय चरण — 11
- तृतीय चरण — 13
- चतुर्थ चरण — 11
चरण 6 — तुक और चरणांत जाँचें
दूसरे और चौथे चरण की तुक, विषम चरणों का आरंभ, चरणांत और समग्र लय जाँचें।
चरण 7 — भाव और भाषा का परिष्कार करें
अंत में देखें कि दोहे का अर्थ स्पष्ट है या नहीं। कहीं मात्रा पूरी करने के लिए अनावश्यक शब्द तो नहीं जोड़े गए हैं। भाषा स्वाभाविक और भाव मौलिक होने चाहिए।
दोहा लिखते समय होने वाली सामान्य गलतियाँ
नए रचनाकार प्रायः कुछ ऐसी गलतियाँ करते हैं जिनके कारण दोहे का छंद बिगड़ जाता है।
1. मात्रा के स्थान पर अक्षर गिनना: लिखित अक्षरों की संख्या और मात्राओं की संख्या अलग-अलग होती है।
2. केवल तुक पर ध्यान देना: दो पंक्तियों में तुक मिल जाने से रचना शुद्ध दोहा नहीं बन जाती।
3. उच्चारण की अनदेखी करना: शब्द का वास्तविक उच्चारण मात्रा गणना में महत्त्वपूर्ण होता है।
4. चरणों का गलत विभाजन: दोहे में चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण की गणना अलग-अलग करनी चाहिए।
5. अर्थ की उपेक्षा करना: मात्रा पूरी करने के लिए अर्थहीन या अस्वाभाविक शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
6. केवल मात्रा पूरी करके संतुष्ट हो जाना: निर्धारित मात्रा-संख्या के साथ चरणांत, यति और अन्य पारंपरिक नियमों की जाँच भी आवश्यक है।
दोहा लेखन का अभ्यास
दोहा लेखन में दक्षता प्राप्त करने के लिए निम्न अभ्यास उपयोगी हैं।
| अभ्यास | उद्देश्य |
|---|---|
| प्रतिदिन पाँच दोहे पढ़ना | छंद की लय समझना |
| प्रतिदिन दो दोहों की गणना | मात्रा ज्ञान विकसित करना |
| एक विषय पर दोहा लिखना | भाव-संयोजन सीखना |
| लिखे हुए दोहों का पुनः परीक्षण | छंद दोष पहचानना |
| प्रसिद्ध कवियों के दोहों का अध्ययन | भाषा और शिल्प समझना |
विशेष रूप से कबीर, रहीम, तुलसीदास और बिहारी के दोहों का अध्ययन करना चाहिए। इन कवियों की रचनाओं में कम शब्दों में गहन अर्थ प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता दिखाई देती है।
दोहा और सोरठा में अंतर
दोहा और सोरठा दोनों अर्द्धसम मात्रिक छंद हैं। इन दोनों में चार चरण होते हैं, लेकिन मात्रा-विधान का क्रम विपरीत होता है।
| आधार | दोहा | सोरठा |
|---|---|---|
| प्रथम चरण | 13 | 11 |
| द्वितीय चरण | 11 | 13 |
| तृतीय चरण | 13 | 11 |
| चतुर्थ चरण | 11 | 13 |
| सामान्य तुक विधान | सम चरण | विषम चरण |
इसलिए दोहे को समझने के लिए सोरठा का अध्ययन भी उपयोगी है।
दोहा छंद का साहित्यिक महत्त्व
दोहा हिन्दी साहित्य की ऐसी विधा है जिसने लोकजीवन से लेकर दर्शन और अध्यात्म तक अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।
कबीर ने दोहों के माध्यम से सामाजिक रूढ़ियों, धार्मिक आडंबरों और मानवीय व्यवहार पर प्रश्न उठाए। रहीम ने नीति, संबंधों और जीवन के व्यावहारिक अनुभवों को दोहों में अभिव्यक्त किया। तुलसीदास ने भक्ति और जीवन-दर्शन को दोहा छंद के माध्यम से जनमानस तक पहुँचाया। बिहारी ने श्रृंगार और भाव-सौंदर्य को अत्यंत संक्षिप्त अभिव्यक्ति में प्रस्तुत किया।
दोहा केवल छंद का अभ्यास नहीं है, बल्कि विचारों को संक्षिप्त, प्रभावशाली और कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करने की कला भी है।
निष्कर्ष
दोहा लिखना एक ऐसी साहित्यिक कला है जिसमें भावों की गहराई और छंद का अनुशासन एक साथ चलते हैं। इसकी शुद्धता के लिए 13–11, 13–11 का मात्रा-विधान, लघु-गुरु का ज्ञान, यति, चरणांत और तुक का ध्यान रखना आवश्यक है।
एक श्रेष्ठ दोहा वही है जिसमें छंद की शुद्धता के साथ विचारों की मौलिकता, भाषा की सहजता और भावों की प्रभावशीलता भी विद्यमान हो।
नियमित अभ्यास, श्रेष्ठ दोहों का अध्ययन और प्रत्येक रचना की सावधानीपूर्वक मात्रा गणना से कोई भी साहित्य-प्रेमी दोहा लेखन में दक्षता प्राप्त कर सकता है।
दोहा केवल दो पंक्तियों की रचना नहीं, बल्कि सीमित शब्दों में व्यापक जीवनानुभव व्यक्त करने की काव्य-कला है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
दोहा छंद किसे कहते हैं?
दोहा एक अर्द्धसम मात्रिक छंद है, जिसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।
दोहे में कुल कितनी मात्राएँ होती हैं?
एक दोहे में कुल 48 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में 24 मात्राएँ होती हैं—पहले चरण में 13 और दूसरे चरण में 11 मात्राएँ।
दोहा छंद का मात्रा-विधान क्या है?
दोहा छंद का मात्रा-विधान 13–11, 13–11 होता है। अर्थात् विषम चरणों (पहले और तीसरे) में 13 तथा सम चरणों (दूसरे और चौथे) में 11 मात्राएँ होती हैं।
दोहा छंद में लघु और गुरु मात्रा का क्या महत्त्व है?
दोहा लिखते समय प्रत्येक वर्ण की मात्रा का सही निर्धारण आवश्यक है। लघु वर्ण की एक और गुरु वर्ण की दो मात्राएँ मानी जाती हैं। इन्हीं के योग से चरण का निर्धारित मात्राभार पूरा होता है।
दोहे में यति कहाँ होती है?
दोहा छंद में सामान्यतः पहले चरण में 13 मात्राओं और दूसरे चरण में 11 मात्राओं के बाद यति होती है। इसी प्रकार तीसरे और चौथे चरण में भी यही क्रम रहता है।
दोहा और चौपाई में क्या अंतर है?
दोहा अर्द्धसम मात्रिक छंद है, जिसका मात्रा-विधान 13–11, 13–11 होता है। चौपाई सम मात्रिक छंद है, जिसके प्रत्येक चरण में सामान्यतः 16 मात्राएँ होती हैं।
क्या दोहे की दोनों पंक्तियों में तुकांत होना आवश्यक है?
परंपरागत दोहे में दूसरे और चौथे चरण के अंत में तुकांत का विधान रखा जाता है। इससे दोहे में लयात्मकता और श्रवण-सौंदर्य आता है।
क्या दोहा लिखने के लिए तुकबंदी आना आवश्यक है?
तुकबंदी सहायक है, लेकिन केवल तुक मिलाना पर्याप्त नहीं है। दोहे में भाव की स्पष्टता, भाषा की सहजता, लय और निर्धारित मात्रा-विधान का पालन भी आवश्यक है।
क्या दोहा आधुनिक विषयों पर लिखा जा सकता है?
हाँ। दोहे में प्रेम, प्रकृति, समाज, राजनीति, शिक्षा, तकनीक, पर्यावरण और समकालीन जीवन जैसे किसी भी विषय को अभिव्यक्त किया जा सकता है। आवश्यक है कि छंद का विधान बना रहे।
दोहा लिखते समय सबसे सामान्य गलतियाँ कौन-सी हैं?
प्रमुख गलतियाँ हैं—मात्राओं की गलत गणना, लघु-गुरु का अनुचित प्रयोग, यति का ध्यान न रखना, तुक के लिए भाव से समझौता करना और कथ्य को जबरन शब्दों में बाँधना।
क्या बिना छंद का ज्ञान प्राप्त किए दोहा लिखा जा सकता है?
प्रारंभिक प्रयास किया जा सकता है, लेकिन शुद्ध दोहा लिखने के लिए मात्रा, वर्ण, लघु-गुरु, यति और छंद-विधान का ज्ञान आवश्यक है। नियमित अभ्यास से इसमें दक्षता प्राप्त की जा सकती है।
दोहा छंद सीखने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
पहले प्रसिद्ध दोहों का अध्ययन करें, फिर उनकी मात्रा-गणना करें। इसके बाद 13–11 के मात्रा-विधान में छोटे-छोटे मौलिक दोहे लिखने का अभ्यास करें और प्रत्येक चरण की मात्राओं की जाँच करें।
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