तुम जीवन हो
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सतत चलें हम
सतत चलें हम
नदी सिखाती सतत चलें हम,
निर्झर-सा हो निर्मल जीवन।
सुमन सुगंध सदा बिखराते,
करें सुवासित उपवन कानन।।
बरगद-पीपल की छाया में,
जीवन को उत्साह मिला है।
पंछी करते कलरव निशिदिन,
सुख संतोष अथाह मिला है।।
पशु-पक्षी गिरि घाटी पर्वत,
धरा बनाते सुरभित सुंदर।
मानव के श्रम से सिंचित हो,
मुस्काते हैं मरुथल बंजर।।
कंकड़-कंटक बीन राह के,
मानवता के सुमन बिछा कर।
सकल जगत में खुशियां बांटें,
भेद-भाव के भवन गिराकर।।
जागें जीवन गढ़ने वाले
कंटक पथ पर बढ़ने वाले।
अंधकार से लड़ने वाले।
द्वार खड़ा है प्रमुदित सूरज,
जागें जीवन गढ़ने वाले।।
पंछी नभ में चित्र बनाते।
तरुवर पात हिला हरषाते।
नाचें जलचर दे दे ताली,
जीवन में उत्साह जगाते।।
रजनी कब की है बीत गई।
उठ गरमी बारिश शीत गई।
समय फलक पर लिखना होगा,
मानव मन की मधु प्रीत नई।।
वसुधा अम्बर का प्यार जगा।
अनुबंध लिखा मनुहार पगा।
रवि किरणों से आँख मिली तो,
मुँह छिपा अँधेरा हार भगा।।
अब जाग सखी
शाम हुई है अब जाग सखी।
दूर स्वयं से मत भाग सखी।
नदी ताल गिरि कानन घाटी।
प्रकृति मनोहर अनुराग सखी।।
जगह प्रदूषित बाहर भीतर।
है सिसक रहा मन-काग सखी।।
चमक रहा बाजार दिनोदिन।
फीके रस राई-फाग सखी।।
सुपथ छोड़ संतान चले जब।
झुके पिता की यश-पाग सखी।
जीवन बीता सूत कातते।
चादर है शुचि बेदाग सखी।।
नेह सूत्र में बंधे सकल जन।
मलय सुवासित शुभ राग सखी।।
प्रमोद दीक्षित मलय
शिक्षक, बाँदा, उत्तर प्रदेश
मोबा. 9452085234
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