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अमानवीयता की पराकाष्ठा (height of inhumanity) पर पहुँचता इंसान
अमानवीयता की पराकाष्ठा (height of inhumanity) : यह कोई पहली घटना नहीँ कि मनुज ने दनुज होने का परिचय दिया हो। हम आये दिन अख़बार और न्यूज़ में पढ़ते और सुनते रहते हैं। अब हालात यह हो गये हैं कि आँकड़े देना भी शर्मशार करते हैं। आँकड़े दे भी तो किसके कि इंसान – इंसान न रहा। आज उसने क्या कुकृत्य किया। सच कहूँ तो मनुष्यों की कुछ प्रतिशत जनसंख्या को मानव कहने में भी मेरी जिव्ह्या काँपने लगी है , आत्मा रोने लगती है । अब प्रश्न यह उठता है कि आख़िर ऐसा क्यों ?
जहाँ तक मेरे संज्ञान की बात है कि इस भागती – दौड़ती ज़िन्दगी में न तो किसी के पास दुःख – दर्द साँझा करने का समय है अपने बुजुर्गों से विचारों का आदान – प्रदान तो जैसे सात जन्म की बात हो गयी। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम उस गहरे अंधकार की ओर भागे जा रहें हैं, जहाँ न वर्तमान में संस्कार है और न ही भविष्य में संस्कृति संरक्षण के कोई उपाय नजर आते है।
जिसे ईश्वर ने बोलने का, सुनने का, समझने – समझाने का और बुद्धि के सकारात्मक और नकारात्मक परिणाम का ज्ञान का वरदान देकर माँ वशुन्धरा की गोद में उतरा। बावजूद इसके की वह इसका सदुपयोग करे न जाने क्यूँ दुर्पियोग पर ही तुला है। जिससे वह न स्वयं का भला कर पाता है और न ही प्राकृतिक जीवों का दर्द समझ पाता है।
हालात यहाँ तक दुष्कर हो गए है कि प्रत्येक त्यौहार से पहले यह समझाना जरुरी समझा जाने लगा कि बेजुबान जानवरों के साथ कोई भी ऐसा कार्य न करें की उनका जीवन संकट में पड़ जाये। क्या सच में हम इतने शिक्षित हो गए हैं कि हृदय में दया , करुणा और ममता जैसे भावों के लिए स्थान ही नहीँ रहा।
यह सब शैक्षिक पद्यति में बदलाओं की देन है। मनुष्य – मनुष्य नहीँ मशीन बन चुका है और मशीन में कोई भाव कार्य नहीँ करता। वह केवल एक स्विच से ऑन – ऑफ होती है। मनुष्य भी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ती में बस ऑन – ऑफ ही होता जा रहा है। जिसका मुख्य कारण मातृभाषा (हिंदी) और देवभाषा (संस्कृत) की अनदेखी है, जो संस्कार और भाव प्रेमचंद जी के निर्मला, गोदान, पूस की रात, बड़े घर की बेटी और महादेवी वर्मा जी की प्रकृति प्रेम की रचनाएँ पढ़कर बच्चों में आते थे, वो अब कहीँ नजर ही नहीँ आते।
इन घटनाओं के प्रति सरकार की उदासीनता या यूँ कहूँ की जो नरमी देखी जाती है , अपराधों के बढ़ने का मुख्य कारण है। जिनके लिए सख़्त कानून का होना ही नहीँ लागू होना भी उतना ही जरुरी है। एकबार कड़े नियमो की पालना करके तो देखिए। समाज से अपराधों की खबर कल के समाचार पत्र में आधी भी हो जायेगी और एक दिन नजर भी नहीँ आएँगी।

क्या दोष था उस बेजुबान गर्भवती हथिनी का, उसने तो कोई नियम भी नहीँ तोड़े थे। किसी को कोई नुकसान भी नहीँ पहुँचाया। बस अपने गर्भ में पल रहे शिशु की भूख शांत करने के लिए भोजन की तलाश में ही तो निकली थी। कौनसी ऐसी माँ है जो अपने जीते जी अपनी संतान को भूखा रखती है, फिर क्यूँ ऐसे कुकृत्य को अंजाम दिया जाता है। क्यूँ इतनी पीड़ा उस माँ की किस्मत में लिख दी जाती है। आख़िर होते कौन है उसे इस तरह तड़पाने वाले, फिर वही शब्द कानों में गूँज जाता है – इंसान।
अब इस घटना के अपराधियों के लिए ऐसी सजा सुनिश्चित की जाए की आने वाली पीढ़ी के लिए एक सीख बन जाये की अपने अधिकारों के साथ – साथ अपने कर्तव्यों का पालन भी उतना ही आवश्यक है जितना की साँस लेना। अगर हम ऐसा नहीँ कर पाए तो संपूर्ण मानव जाति को परिणाम भुगतना होगा। दुष्कर्मी एक होता है परंतु परिणाम सभी को झेलना होता है। जैसे – महाभारत में केवल एक दुर्योधन के दुष्कर्मों के कारण संपूर्ण कौरव कुल का विनाश हुआ। रामायण में एक रावण के अहम ने पूरी लंका का नाश तय कर दिया।
वर्तमान परिस्थितियों को देखकर भी मानव अपनी विषैली सोच और क्रूरता से बाहर नहीँ निकल सकता तो उसके पास बहुत से ऐसे शस्त्र हैं, जिससे मानव जाति को मार्ग पर लाने में देर न लगेगी। अभी तो केवल घर में बैठने को कहा है। बहुत दोहन कर लिया तुमने धरा का, बहुत भाग – दौड़ कर ली, जो अहम मनुष्य के मस्तिष्क में घर कर गया था। उसे (ईश्वर को) केवल एक पल लगा तुम्हे तुम्हारे परकोटे में बंद करने में।
एक माँ जो बच्चे को जन्म देती है और अपने संस्कारों से पोषित कर इंसान बनाती है, फिर ऐसा क्या हो जाता है कि वह जैसे – जैसे अपने कदमो से आगे बढ़ने लगता है तो एक नया रूप धारण कर लेता है। जिस रूप में उसे उसकी माँ ने ढाला था वह उसे भूलता चला जाता है। आखिर क्यों वह अपने माता – पिता की शिक्षा – दिक्षा को भूलने पर मजबूर हो जाता है। घटना जो उस गर्भवती माँ के साथ घटी, घटनी चाहिए थी, नहीँ बिलकुल भी नहीँ !
शायद इंसान भूल चुका है कि हमारी संस्कृति और सभ्यता पशुओं में भी देवताओं का निवाश बताती है। हाथी अर्थात श्री गणेश जी और उनकी माता जी अर्थात माँ पार्वती अर्थात स्वयं संहार कर्ता भगवान महेश की अर्धांगनि। अब इस कुकृत्य का परिणाम क्या होगा जान ले इंसान।
अब भी इंसान अपना अस्तित्व बचाना चाहता है तो लौट आए अपनी संस्कृति, अपने वेदों, उपनिषदों, अपने धार्मिक ग्रंथों, अपनी भाषाओं, अपनी सभ्यता और अपने बुजुर्गों की ओर। किसी भी शुभ कार्य के लिए कभी देरी नहीँ होती। लौट आओ। लौट आओ।
समय जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाता है
व्यस्त जीवन प्रणाली में जैसे सभी खो से गए थे। जैसे समय ही नहीँ था किसी के पास भी, सब दौड़ते चले जा रहें थे। माता – पिता अपने बच्चों को समय नहीँ दे पा रहे थे तो उनके हृदय में प्रेम के अंकुर फूटने जैसे बंद ही हो गए। अपने बुजुर्गों की देखरेख न कर पाने के कारण उनकी मानसिक शांति जैसे भंग ही रहती थी, वो भी क्या करते आजीविका को समृद्ध बनाने के चक्र में सब कुछ जैसे उलझता ही जा रहा था।
एक वायरस ऐसा आया जैसे सब बदल सा गया। सब अपने अपनों के साथ अपने ही घर में कैद हो गए। जैसे वो यह कह रहा हो, जो छूट गया है उसे जी लो। फिर से झंकृत करो अपने घर के आँगन की झालर को। झाँको अपने माता – पिता के दिल की गहराईयों में। फिर से वात्सल्य की मीठी गंगा बहने दो। नैतिकता की, बहादुरी की, राजाओं की, बौद्धिकता की, धर्म की, ज्ञान की और कुछ हास्य की कहानियों को फिर से रात के शांत माहौल को कुछ वैज्ञानिक हो जाने दो।

साथ ही अनुभव रहा कुछ अनदेखी, अनसुनी सी बाधाओं का। विद्यालय बंद, कार्यालय बंद, कंपनी बंद, यातायात बंद या यूँ कहें व्यवसाय बंद । जीवन का चक्र जो समय से तेज भागता जा रहा था, एकाएक दम तोड़ देता है। मनुष्य ऐसे में कैसे रह सकता है परंतु उसने यहाँ भी अपनी बौद्धिक क्षमता का परिचय देते हुए सब स्वीकार कर लिया और जीने का नया ढंग सीख लिया। धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन, बुजुर्गों की देखभाल, बच्चों के प्यार में घुल जाना, जैसे उसकी दिनचर्या में शामिल हो गया। दोस्तों से हँसी – मज़ाक जैसे रामबाण बन गया। वाकई ईश्वर की यह रचना अद्भुत है। जैसा समय सामने आता है, ढलता चला जाता है।
साहित्य के प्रति अपनी अनन्य भक्ति रखने वाले रचनाकार भी प्रतिकूल परिस्थितियों में हारे नहीं। अपनी लेखनी की शक्ति और ऊर्जा से संपूर्ण भारत में जन जागृति अभियान की तरह अपनी बात जन – जन तक स्वर्णिम शब्दों में पहुँचा रहें है। जिसका आने वाले समय को सशक्त बनाने में बहुत बड़ा योगदान रहेगा।
कुछ ऐसी स्थिति भी देखने को मिली जिससे कष्ट हुआ और सभी को समान रूप से हुआ। बाधाएँ, बाधाएँ होती हैं और वो सबके लिए होती हैं। कोई कम प्रभावित होता है कोई ज़्यादा बस फर्क इतना ही है परंतु भारत की जनता का हौसला नमनीय है।
अंत में उन योद्धाओं की बहादुरी को सलाम करती हूँ जो समाज की देश की रक्षा में ऐसे तैनात हो गए जैसे देश की सीमा रेखा पर हमारे फौजी सीना ताने खड़े रहते हैं। क्या नहीँ झेलना पड़ा उनको फिर भी अपने कर्तव्य का पालन और अपने फ़र्ज को निभाने में सबसे आगे खड़े हैं। शत शत नमन है। जय जय भारत…!
चंद्रमणि मणिका
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