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मौन
मौन
मौन तो मौन
तो फ़िर अंजान कौन
यही है मौन
मौन…
मौन तो एक लम्बा स्वास
सुखद अनुभव और एहसास
पहचाने कौन
बस यही है मौन
मौन
या तो व्यक्ति कुछ नहीं जानता
या फ़िर बहुत कुछ पहचानता
जानते हुए भी चुप्पी साधे गौण
बस यही है मौन
मौन…
हो रही झूठ की जय-जय कार..
हो रही झूठ की जय-जय कार
हो रही झूठ की जय-जय कार
गली गली मचे शोर और हर मोड़ पर हाहाकार के
हो रही झूठ की जय-जय कार
हो रही झूठ की जय-जय कार…
बिन तेरे तो प्रभु यहाँ पर पत्ता तक नहीं हिलता
बिना तेरी इज़ाज़त के तो यहाँ कुछ भी नहीं है मिलता
फ़िर क्यों त्रस्त यहाँ जब हर कोई सेवादार
हो रही झूठ की जय-जय कार
हो रही झूठ की जय-जय कार…
लाखों अरबों के हो गए यहाँ पर गबन घोटाले
डर के मारे लोगों ने तो सांप तक ही पाले
नहीं दिखाई देता यहाँ पर कोई ईमानदार
हो रही झूठ की जय-जय कार
हो रही झूठ की जय-जय कार…
शुरू में यहाँ हर किसी को रहा एक भरोसा
वक़्त के चलते इन्होंने उनको ही तो कोसा
चीर हरण में दोषी ही गाएँ राग दरबार
हो रही झूठ की जय-जय कार
हो रही झूठ की जय-जय कार…
पैसा ही तो इस जग में पैसे को खींचे
हर कोई यहाँ मस्त मलंगा बस अपनी आँखें मींचे
नहीं किसी को किसी से यहाँ कोई सरोकार
हो रही झूठ की जय-जय कार
हो रही झूठ की जय-जय कार…
पैसे ही से तो यहाँ पर सब कुछ है मिलता
ग़रीब की तो यहाँ कोई भी नहीं है सुनता
रसूख वाले ही यहाँ भरते नित नई हुंकार
हो रही झूठ की जय-जय कार
हो रही झूठ की जय-जय कार…
नित्य यहाँ नए झूठे फ़रेबी और कोरे अहंकारी
फल फूल रही यहाँ झूठ की बेबस फुलवारी
देश प्रेम की आड़ में खुल्ले नफ़रत के बाज़ार
हो रही झूठ की जय-जय कार
हो रही झूठ की जय-जय कार…
समझना पड़ेगा क्यों यहाँ पर बेबसी और लाचारी
साधन संपन्न होते हुए भी क्यों यहाँ बहुत बेरोज़गारी
कहाँ सो गया रे सबका अपना सांझा चौंकीदार
हो रही झूठ की जय-जय कार
हो रही झूठ की जय-जय कार…
हर मोड़ पर हाहाकार
हो रही झूठ की जय-जय कार
हो रही झूठ की जय-जय कार…
दोषी ही गाएँ राग दरबार
हो रही झूठ की जय-जय कार
हो रही झूठ की जय-जय कार…
खुल्ले नफ़रत के बाज़ार
हो रही झूठ की जय-जय कार
हो रही झूठ की जय-जय कार…
कहाँ गया सांझा चौंकीदार
हो रही झूठ की जय-जय कार
हो रही झूठ की जय-जय कार…
बस पैसे का बोलबाला…
इस दुनियाँ में ईमान…ज़मीर…इंसानियत…रिश्ते
हर चीज़ बारीक हो रही बिना ही पिसते
रिश्तेदार…परिवार…दोस्त…मितर…प्यारे
क्या बताएँ अब कौन कहाँ जा रहे
ईमान…बईमान हो गया
ज़मीर…जाने कहाँ खो गया
इंसानियत पता ही नहीं…थी भी कि नहीं
रिश्ते…सब रिस रहे
रिश्तेदार…अपने ही बेक़ार
परिवार…हर कोई करे वार
दोस्त मितर…यार…सभी को पैसे से प्यार
सामाजिक दायरे और समाज
कोई किसी का नहीं आज़
राजनैतिक स्वयंभूओं की भरमार
सब के सब भेदने को तैयार
हर कोई तो तमाशबीन
ख़ास तौर पर जो गद्दी नशीं
कहीं सिर्फ़ सौदागर
किस किस को करें उजाग़र
किस के बारे में क्या बताएँ
अपने जज़्बात कहाँ तक छुपाएँ
खुल्ले आम हो रहे क़त्ल-ए-आम
सब कुछ तो हो गया तमाम
कैसा किसका अब बचा आधार
सबका ही तो हुआ बंटाधार
अब तो पैसे का इतना बोलबाला
तेरहवीं पर भी विवाह शादी-सा हो हल्ला
कहीं भरी सड़क ख़ाली कहीं ख़ाली मार्ग पर जाम
हर ज़रूरत के समय अनुसार पूरे इंतज़ाम
ना बचा कुछ सफ़ेद और ना ही काला
सब ज़गह बिन मतलब बस पैसे का बोलबाला
बस पैसे का बोलबाला…
बापू तेरे तीन बन्दर…
बापू तेरे तीन बन्दर
लिए चोट दिल के अंदर
जाने कहाँ खो गए
बापू तेरे…
संदेशा तेरा सदा से रहा बहुत ही गहरा
समाज पर सदा से ही रहा सशक्त पहरा
क्या हालात बने कि अब छूमन्तर हो गए
बापू तेरे…
बूरा न बोलना है सदा प्रहरी सोच
ज़ख्म जो कभी न भरे वह गहरी चोट
होटों की मुस्कान पर अब कत्लेआम हो गए
बापू तेरे …
बुरा न देखना अब रह गया केवल संदेश
विदेश क्यों लगने लगा अब अपना ही देश
जाने क्यों सभी अनोखी संभयता में खो गए
बापू तेरे…
बुरा न सुनना अब लगे सभी को अज़ीब
रिश्तें नज़दीकी मगर दूरियाँ हो गई बहुत क़रीब
सच सुनने वाले कान अब कहाँ सो गए
बापू तेरे…
तीनों के कर्म यहाँ बड़े ही निराले
खाये गहरी चोट् पर सदा दूसरों को सम्भालें
कौशल बेबस ज़िंदगी के माईने क्यों खो गए
बापू तेरे…
दुनियाँ में जीने के लिए बदलाव बहुत ज़रूरी
देशहित सदा सर्वोपरि चाहे जो मज़बूरी
जान हथेली पर रख जीने वाले कहाँ खो गए
बापू तेरे…
उनके हो चले…
थोड़ी देर ही पहले सोच रहे कहाँ चलें
कुछ देर बाद हम तो बस उनके हो चले
बड़ा ही उम्दा रहा उनका अंदाज़ ए बयाँ
मिल कर हम भी बड़े ख़ुश हुए मियाँ
मिल कर आहिस्ता से जो दबाया उसने हाथ
गुफ्तगू करने का अंदाज़ बख़ूबी सिखाया अपने साथ
शरमा कर जो अपना सिर क्या झुकाया उसने
हमें और उलझन में ज़रा-सा उलझाया उसने
ग़ज़ब हमसे मिलाकर नज़र क्या मुस्कुराए वो
मुझ साधारण से को यूंही दीवाना बनाया जो
आगे बढ़ते क़दम पीछे पलट कर उनका देखना
मंज़िल तक चलेंगे साथ बस यही समझाया देखना
ख़नका चूड़ी हवा में दुपट्टा जो उसने लहराया
लगा दिल में जैसे कोई अपना ही उतर आया
संवार कर जुल्फें जैसे ही फूल बालों में लगाया
मौसम ए फ़िज़ा को कुछ और रंगीन बनाया
आँखों में आँखें डाल की जो नज़र से जताया
लगा जैसे अपना हमदम हमराज़ हमें बनाया
क्या बताएँ जताएँ या फ़िर मान कर चलें
कुछ देर पहले रहे अंजान अब उनके हो चले
उनके हो चले उनके हो चले
बड़े दानवीर कहलवायेंगें…
है न क़माल
धोती फाड़ी बना दिया रुमाल
आज ख़ुद हाथ जोड़
बना कर अपना गठजोड़
अपना बता
कर के ख़ता
अंजान से जानकार बनने वाले
वाकपटुता सहारे भीख मांगने वाले
ऐसा कुछ बड़ा कर पल जायेंगें
हमें ही धोख़ा दे तरीक़े से छल जायेंगें
कल तक सबसे बड़े दानवीर बन
हर में खानें वाली वस्तु के लगा कर घुन
हमें ही तो ठगेंगें
फ़िर बिना रंग रंगेंगें
जो मूलभूत सुविधाएँ हमारे लिए
फ़िर बस केवल इनके लिए
उन्हीं को डकार जायेंगें
फ़िर जेब भर फ़रार जायेंगें
हमें एक थैली में राशन भर
ख़ुद अनेक-अनेक बोरियाँ भर
हमें कहीं नज़र ही नहीं आयेंगें
हमारे लिए अच्छे दिन बताएंगें
है न कितना क़माल
हर पल होता धमाल
आज हमसे ही मांगनें वाले
सरबत का भला चाहने वाले
अपने आप को ही योग्य बतलायेंगें
कल हमसे ही दानवीर कहलवायेंगें
बड़े दानवीर कहलवायेंगें
बड़े दानवीर कहलवायेंगें…
सुस्त रहे कुछ रास्ते…
सुस्त रहे कुछ रास्ते…
सुस्त रहे कुछ रास्ते पर मंज़िल क़रीब आई
किसी की पढ़ाई में ग़रीबी चाहे रुकावट बनी
आख़िरकार अक्षरज्ञान ही उसकी चाहत बनी
हर संभव मदद उसे क़रीब ले आई
सुस्त रहे कुछ रास्ते…
किसी ख़ातिर कई कारण रही पढ़ाई मीलों दूर
भोजन तक भी एक समय मुश्क़िल रहा हज़ूर
पढ़ाने वाले का हौंसला हिना-सा रंग लाई
सुस्त रहे कुछ रास्ते…
क़िताब संग रोटी का भी रहा थोड़ा फांसला
ज़नून कारण ही कुछ भी न पता चला
बिना बाती के मोमबत्ती भी रोशनी ले आई
सुस्त रहे कुछ रास्ते…
कभी किसी के माँ बाबूजी भी न चाहते
उन्हें भी मनाया गया हर तरक़्क़ी के वास्ते
असल ज़िन्दगी की कहानी हर तरफ़ निख़ार लाई
सुस्त रहे कुछ रास्ते…
हमारे और आपके बीच की मज़बूरियों को चुना
हर शिक्षक ने न जाने कैसे रास्ता बुना
यही शिद्दत बंज़र खेत में फ़सल उगा लाई
सुस्त रहे कुछ रास्ते…
शिक्षक को झेलनी पड़ी नकारात्मक पहलुओ की मार
कभी साधन कभी कापी क़िताब की भयंकर मार
कठिन रास्तों पर चल मंज़िल नज़दीक लाई गई
सुस्त रहे कुछ रास्ते…
शिक्षक हज़ारों बार समय पर कक्षा में आया
नतीजन चंद्रयान तक़ सही कक्षा में पहुँचाया
विज्ञानिक सोच समय पर हर विपदा हर आई
सुस्त रहे कुछ रास्ते…
हर शिक्षक हमारे लिए एक प्रेरणा स्रोत
शिक्षा मन्दिर में जगाते सदा ही अखंड ज्योत
क़िताब में लिखे हर अक्षर की लौ हर लाई
सुस्त रहे कुछ रास्ते…
कई शिक्षकों ने ज़रूरतमंद की कर हर संभव मदद
बच्चों की क़ामयाबी सहारे तोड़ डाली हर हद्द
दिन-रात एक कर रात को ही नई सुबह बनाई
सुस्त रहे कुछ रास्ते…
आपका अपना
वीरेन्द्र कौशल
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