कृष्ण-द्रौपदी संवाद
कृष्ण-द्रौपदी संवाद (चीरहरण प्रसंग) पर आधारित यह भावपूर्ण काव्य खण्ड श्रद्धा, भक्ति, विश्वास और धर्म की विजय का अद्भुत चित्रण करता है। द्रौपदी की पुकार और श्रीकृष्ण की करुणा से जुड़ा यह प्रसंग पाठकों को गहन आध्यात्मिक प्रेरणा प्रदान करता है।
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🕉️ कृष्ण-द्रौपदी संवाद
(चीरहरण प्रसंग पर आधारित काव्य खण्ड)
सभा सजी थी राजमहल में,
पर धर्म कहीं पर रोता था,
सिंहासन के ऊँचे मद में
मानव भीतर से छोटा था।
मुकुट सजे थे शीशों पर,
पर विवेक कहीं सोया था,
सत्ता के अंधे गलियारों में
सत्य अकेला खोया था।
कौरव हँसते थे मद में डूबे,
पांडव सिर झुकाए थे,
अपने ही कर्मों की अग्नि में
धर्मराज पछताए थे।
जुए की उस निर्दयी ज्वाला में
सब कुछ दांव लगाया था,
राज्य, वैभव, धन, अस्त्र-शस्त्र…
फिर खुद को भी हराया था।
पर पाप वहाँ सीमा लांघ गया
जब नारी का मान लगा,
सभ्यता की सांसें थम गईं,
जब द्रौपदी का नाम लगा।
दुर्योधन हँसकर बोला तब—
“अब इसको भी ले आओ यहाँ,
जिस भाग्य के भरोसे जीती थी,
उसका सच दिखलाओ यहाँ।”
दुःशासन उठा विकराल रूप में,
क्रूर हँसी अधरों पर थी,
उसके हाथों में केवल शक्ति नहीं,
अंधी सत्ता की जिद भी थी।
केश पकड़कर राजसभा में
द्रौपदी को घसीटा गया,
नारी के सम्मान को जैसे
पत्थरों से पीटा गया।
काँप उठी थीं सभा की दीवारें,
धरती भी शर्माई थी,
पर बैठे हुए महान योद्धाओं में
कोई आँख न भर आई थी।
द्रौपदी ने चारों ओर
आखिरी आशा से देखा था,
हर अपने चेहरे पर उसने
सिर्फ मौन को देखा था।
“पितामह…!” स्वर काँप गया,
“क्या नारी बस वस्तु होती है?
जिसे जुए में हार दिया जाए,
क्या उसकी कोई आत्मा नहीं होती है?”
भीष्म मौन थे…
द्रोण मौन थे…
विदुर की आँखें नम थीं,
पर राजसभा के उस भय में
सबकी आत्माएँ कम थीं।
द्रौपदी फिर बोली करुणा से—
“धर्मराज! उत्तर दो मुझको,
जिसने पहले खुद को हारा,
क्या अधिकार था फिर मुझ पर उसको?”
युधिष्ठिर के झुके नयन
अपने अपराध छुपाते थे,
वो धर्म के ज्ञाता होकर भी
उस दिन धर्म न बचा पाए थे।
दुर्योधन ने क्रोध में आकर
फिर आदेश सुनाया था—
“दुःशासन! खींचो चीर इसका,
आज सभा को तमाशा दिखलाया जाए!”
उस क्षण द्रौपदी टूट गई थी,
विश्वास सभी बिखराए थे,
जो अपने कहलाते थे
सब पत्थर बनकर आए थे।
काँपते अधरों से तब उसने
धीमे स्वर में पुकारा था—
“हे माधव…!
अब तुम बिन मेरा कौन सहारा था?”
“हे द्वारिकाधीश!
मैंने सब द्वार खटखटाए हैं,
हर रिश्ता मौन खड़ा है,
सब अपने भी पराए हैं।”
दुःशासन ने चीर पकड़कर
क्रूर हँसी बिखराई थी,
सभा के हर कोने में तब
मानवता शर्माई थी।
तब…
दूर कहीं द्वारका में बैठे
मुरलीधर मुस्काए थे,
भक्त की पीड़ा सुनकर जैसे
स्वयं समय रुक जाए थे।
कृष्ण बोले—
“द्रौपदी…
जब तक मन में अहं रहेगा,
और जग से आस रहेगी,
तब तक तेरी पीड़ा को
ये दुनिया बस देखेगी।
पर जिस क्षण सब छोड़ मुझे तू
पूर्ण हृदय से अपनाएगी,
उस क्षण तेरी लाज बचाने
स्वयं कृपा दौड़ी आएगी।”
द्रौपदी ने आँसू रोके,
दोनों हाथ उठाए थे,
अब न सभा, न कोई अपना—
बस कृष्ण ही याद आए थे।
“गोविन्द…!
अब जीवन भी तुझको अर्पण,
मान भी तुझ पर वार दिया,
अब मेरी हर सांस ने केवल
तेरा ही आधार लिया।”
और तभी…
एक अद्भुत लीला जागी,
चीर अनंत हो जाता था,
दुःशासन जितना खींचे,
वस्त्र उतना बढ़ जाता था।
थककर उसके हाथ रुक गए,
सांसें भारी हो आई थीं,
पाप की सारी शक्ति वहाँ
कृष्ण भक्ति से हार गई थी।
सभा स्तब्ध थी…
अहंकार झुक गया था,
एक नारी की पुकार पे
स्वयं ईश्वर रुक गया था।
तब कृष्ण का स्वर गूँजा—
“सुनो सभाओं के रखवालों!
नारी का अपमान जहाँ होगा,
धर्म वहीं अपमानित होगा,
और विनाश का आरंभ वहाँ होगा।
जो अन्याय देखकर भी
मौन खड़े रह जाते हैं,
इतिहास उन्हें भी अपराधी
लिखकर याद कराते हैं।”
द्रौपदी की आँखों में अब
आँसू नहीं, ज्वाला थी,
उस अपमान की अग्नि से ही
महाभारत की ज्वाला थी।
क्योंकि…
जब सत्ता अंधी होती है,
और धर्म कहीं सो जाता है,
तब किसी द्रौपदी की रक्षा को
स्वयं कृष्ण आ जाता है… 🕉️
~ मनोज कुमार ‘मंजू’
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