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दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी
दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी: निःशब्द हूँ, मौन हूँ, व्यथित हूँ और इस विलाप को देखकर सुविधाओं और योजनाओं का दम भरने वालों पर क्रोधित भी हूँ। सोशल मीडिया हमेशा बुरा ही नहीं, फालतू ही नहीं ब्लकि कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएँ भी दिखा देता है जो भीतर से झकझोर देती हैं। आज भी मुद्दा बहुत संवेदनशील और सोचने पर विवश करने वाला है। कल रात ही तो इंस्टाग्राम पर एक वीडियो देखी, नहीं जानता वीडियो नया है या पुराना लेकिन इससे फ़र्क़ ही क्या पड़ता है क्योंकि जो दर्द, विलाप, संवेदना उस वीडियो में है शायद काफ़ी है पत्थर का हृदय भी झकझोर देने के लिए।
पिता जो हमेशा कठोर दिखाई देते हैं जल्द ही भावुक नहीं होते, ऐसे ही एक पिता की गोद में उसके ३-४ साल के मासूम बच्चे का शव, जो सही समय से इलाज़ के अभाव में अस्पताल पहुँचने से पहले ही दम तोड़ गया। कारण उनके यहाँ पर उचित इलाज़ का ना मिल पाना और जब वें अपने बीमार बच्चें को लेकर अपनें यहाँ से लगभग ३०० किलोमीटर दूर किसी दूसरे शहर तक गये तो रास्ते में ही उस बच्चे की मृत्यु हो गयी। एक पिता के लिए इससे ज़्यादा कष्टदायक पीड़ा और क्या होगी कि असुविधाओं और समय के क्रूर हाथों ने उसके मासूम बच्चे को लील लिया। उस पिता का बिलखना, रोना, उस बच्चे को पुकारना सच कहता हूँ अभी तक भी मुझे सुनायी दे रहा है, दिखाई दे रहा है। वह विलाप जिसने काफ़ी समय बाद फिर से कुछ लिखने के लिए प्रेरित कर दिया। घटनाएँ घटित होती है बस अनदेखा कर दिया जाता है। भारत जाे विश्व पटल पर एक महाशक्ति के रूप में स्थापित होने को अग्रसर है, बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में विश्व में उभर रहा है, उसकी प्रगति पर यह सवाल उठता है कि क्या सच में हम एक महाशक्ति है?
शायद नहीं, अभी हमें महाशक्ति और महान अर्थव्यवस्था का उदाहरण बनने के लिए काफ़ी कुछ करना है। ऐसी मार्मिक वीडियो यदा-कदा देखने को मिल ही जाती है। कभी शवों को एंबुलेंस नहीं मिलती, कभी अस्पतालों में उचित इलाज़ नहीं मिलता तो कभी अस्पताल ही नहीं मिलता। कहीं कोई पिता अपनें बच्चे के शव को गत्ते के डिब्बे में लेकर जाता है तो कोई रेहड़ी पर डालकर घर पहुँचता है, कहीं अस्पताल में उचित इलाज़ के अभाव में २००-३०० किलोमीटर तक जाना पड़ता है, भाग्य ने साथ दिया तो आप सकुशल घर वापिस आएंगे अन्यथा तो परलोक की यात्रा पक्की। सरकारी अस्पतालों में उच्च सुविधाएँ नहीं है, तो कहीं तो अस्पताल भी नहीं है, कहीं दवाएँ नहीं है और कहीं डॉक्टर ही नहीं है, कहीं-कहीं हायर सेंटर भी इतने दूर है कि जब तक मरीज वहाँ पहुँचता है तब-तक देर हो चुकी होती है। यह व्यवस्था बदलनी चाहिए।
जब तक एक नागरिक भी इस प्रकार इलाज़ के अभाव में अपनी जान गंवाता रहेगा तब तक “महान” शब्द दूर नज़र आएगा। जब तक गरीब की थाली में भरपेट भोजन नहीं होगा तब तक स्वयं को “महाशक्ति” कहना जल्दबाजी होगी। कोई भी राष्ट्र तब तक महान राष्ट्र नहीं बन सकता जब तक वहाँ के “जन” (लोग) सुःखी, समृद्ध और व्यवस्थित जीवन नहीं गुजारते। किसी भी राष्ट्र का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग वहाँ के लोग और उनका जीवन होता है। अगर वह ही निम्न स्तर का होगा तो कैसी तरक्की, कैसा विकास? भारत में अगर सर्वे किया जाए तो अमीर वर्ग से ज़्यादा निचला या गरीब वर्ग है। कुछ किसान हैं, तो कुछ मजदूर। यहाँ तक की मज़दूर वर्ग अपना घर-बार छोड़कर सैंकड़ों किलाेमीटर दूर पलायन कर जाते हैं। सच कहूँ तो कभी-कभी लगता है कि गरीब अर्थव्यवस्था का हिस्सा है भी या नहीं। योजनाएँ और वायदे हर बार होते हैं लेकिन वास्तविकता के धरातल पर सभी पूरे नहीं उतर पाते। एम्स जैसी सुविधा वाले अस्पताल सभी जगह नहीं हैं लेकिन कई शहरों में किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सुविधाओं से लोग आज भी वंचित है। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी लोग समय पर उचित इलाज़ ना मिल पाने के कारण, पैसे की कमी के कारण, अच्छे अस्पतालों के अभाव में प्राण छोड़ देते हैं, पैसों के अभाव में अपनों के शवों को कोई बाइक से, कोई रेहड़ी पर तो कोई अपनी पीठ पर लाद कर ले जाने को मजबूर हो जाता है। सबसे ज़्यादा जान गंवाने वालों में छोटे बच्चे होते हैं जो सही इलाज़ के अभाव में अव्यवस्थाओं के चलते अपनें प्राण गंवा देते हैं। मीडिया में यह सब आने के बाद भी इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता।
सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह सभी लोगों के लिए बेहतर इलाज, बेहतर इलाज़ करने वाले, बेहतर और सस्ते अस्पताल जो गंभीर और जटिल समस्याओं का इलाज़ भी कर सके, ऐसे अस्पताल बनने चाहिए जहाँ सभी सुविधाएँ मौजूद रहे और जिनकी दूरी भी ज़्यादा ना हो जिससे समय के अभाव में किसी की जीवन लीला समाप्त ना हो, इतना ही नहीं सरकार द्वारा जिस भी जगह के लिए योजनाएँ और वित्तीय सहायताएँ भेजी जा रही है उस स्थान का एक सर्वेक्षण भी करे कि कार्य हुआ भी है या नहीं। एक ऐसे पैनल का गठन करे जो इन योजनाओं का सारा ब्यौरा रखे, घटनाओं की जानकारी भी इकट्ठा करें ताकि किसी प्रकार का भ्रष्टाचार ना फैले और ना ही कोई भी गरीब मासूम इलाज़ के अभाव में प्राण ना गंवाये क्योंकि उनके कष्टों को लोग और मीडिया देखते और दिखाते ज़रूर हैं लेकिन वह लोग सिर्फ़ एक खब़र बनकर रह जाते हैं॥
लेखक
वरूण ढलौत्रा
सहारनपुर (यू०पी०)
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