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अबकै ही तो आई खुशियों वाली दिवाली
अबकै ही तो आई खुशियों वाली दिवाली
गाँव के पूर्व मुखिया बसेशर लाल और उनकी पत्नी राधा के क़दम ज़मीन पर नहीं पड़ रहे। शहर जा बसे दोनों बेटे अपने परिवार के साथ गाँव में आ रहे हैं। वह भो एक-दो दिन के लिए नहीं। जब तक लोकडाउन और कोरोना महामारी से राहत नहीं मिलेगी, वह यहीं रहेंगे। छोटे बेटे रमन ने जब से फ़ोन कर यह सूचना दी है। दोनों की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं है।
तीन दिन से घर की साफ़ सफ़ाई चल रही है। ख़ुद बसेशर लाल पास खड़े होकर अपने पुराने हवेलीनुमा मकान की लिपाई-पुताई करवाने में जुटे हैं तो राधा पड़ोस की श्यामा के साथ मिठाई और नमकीन बनवाने में जुटी है। तिकोनी मठ्ठी, मटर, सूखी मसालेदार कचोरी बनाई जा चुकी है। श्यामा साथ के मकान की पुत्रवधु है। वह राधा को बोली कि इतनी नमकीन का क्या करेंगे। राधा का जवाब था-अरे बहु-बेटे बच्चों के साथ आ रहे है। कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।
श्यामा बोली-अम्मा, आते तो वह हमेशा ही है। एक-दो दिन में वापस चले जाएंगे। उसके लिए इतना सामान क्यों बनवा रही हो। वह साथ भी नहीं ले जाएंगे। बांटोगी भी कितना। बाद में इन्हें गायों को खिलाना पड़ेगा। हर बार यही तो होता है। श्यामा की बात ग़लत भी नहीं थी पर ममता अपनी जगह थी। जीत तो उसी की होनी थी। उधर, बसेशर लाल अपने हिसाब से काम में लगे थे। बढ़ई को बुला तीन पुराने पलंगों और दोनों तख्तों को ठीक करवाया जा चुका था। राधा के पुराने सन्दूक से निकली गई नई बेडशीटों ने उन्हें ढक बैठक को अलग ही रूप दे दिया था।
आज वह दिन आ ही गया। राधा ने सुबह श्यामा की बेटी सुनहरी और उसकी एक सहेली विद्या के सहयोग से घर के बाहर बड़ी-सी रंगोली बनवा दी। कोई उसके ऊपर से गुजर इसे खराब न कर दे। इसके लिए घर के गेट पर लाठी लेकर ख़ुद बैठी हुई है। आज तो दोपहर का भोजन भी वही किया। शाम ७ बजे तक उनके पहुँचने की उम्मीद थी। अन्धेरा होते ही राधा ने मुंडेर दीयों से रोशन कर दी। सारा घर दिवाली ज्यों जगमग कर रहा था। साढ़े ७ बजे एक बड़ी गाड़ी घर के आगे आकर रुकी। आवाज़ सुनते ही राधा पूजा की थाली लेकर गेट पर पुहंच गई। पहले सबके तिलक किया फिर आरती उतारी। बहु-बेटों ने पैर छू आशीर्वाद लिया और घर में प्रवेश किया। राधा दोनों पोतों के साथ बातों में मग्न हो गई।
बड़ा बेटा वीरेन और छोटा रमन हैरान थे कि आज न तो दिवाली है न कोई और त्योहार। फिर घर आज इस तरह रोशन क्यों है। दोनों बहुएँ रीना और माधवी भी इस प्रश्न का जवाब जानना चाहती थी पर बाबूजी से पूछने की हिम्मत किसी की नहीं हो रही थी। रमन के बेटे राहुल के पूछे गए सवाल ने सबके कान खड़े कर दिए। वह बोला-दादा, आज दिवाली है क्या। दादा हंसे। पहले राधा की तरफ़ देखा फिर बेटे बहुओं की तरफ। सब एकटक उनके जवाब की बाट जोह रहे थे।
बसेशर लाल को अपने पोते से इस तरह के प्रश्न की उम्मीद नहीं थी पर अब जवाब तो देना ही था। बोले-हाँ, बेटा आज दिवाली ही है। तभी तो घर दीयों से जगमगा रहा है। अब दूसरे पोते राघव ने सवाल दाग दिया। बोला-दादा जी, दिवाली है तो पटाखे क्यों नहीं बज रहे। इस बार चुप बैठी राधा ने जवाब दिया। बोलीं-तुम दोनों जब से आये हो तब से अपनी प्यारी बोली से पटाखे ही तो बजा रहे है। खुशियों की फुलझड़ियाँ छूट रही है। खिलखिलाहट के अनार फूट रहे हैं। सब साथ तभी दिवाली। सब नहीं तो कैसी दिवाली। राधा के ये कहते ही सब समझ गए कि असली दिवाली तो आज ही है। बहुएँ बोलीं-अम्मा अबके ये दिवाली तो लंबी चलेगी। रात को सोते समय बसेशर लाल राधा से बोले-होगी किसी के लिए ये महामारी। हमारे लिए तो ये वरदान बनकर आई है। किसी को फुर्सत ही नहीं थी। भगवान भी न अपनों को जोड़ने का कोई न कोई बहाना बना ही देते हैं। राधा बोली-अब सो जाओ, कल से तुम्हारी वही खुशियों वाली सुबह शुरू होने वाली है।
सुशील कुमार ‘नवीन’
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