हास्य-व्यंग्य से भरपूर ‘कॉकरोच जनता पार्टी चालीसा’ समाज और राजनीति की विडंबनाओं का अनोखा चित्रण प्रस्तुत करती है। तीखे कटाक्ष, रोचक शैली और समसामयिक संदर्भों से सजी यह रचना पाठकों को गुदगुदाने के साथ सोचने पर भी मजबूर करती है।
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कॉकरोच जनता पार्टी
दोहा
जय जन-बल जय युवा-शक्ति,
बिना नौकरी व्याकुल मति।
सिस्टम को आइना दिखावे,
कॉकरोच जनता पार्टी कहावे॥॥
चौपाई
जय कॉकरोच ज्ञान गुन सागर।
सोशल मीडिया शक्ति उजागर॥
डिग्री लेकर फिरे बेचारी।
सुन सुन बातें भारी-भारी॥
तंज कसा जब सिस्टम सारा।
तब युवाओं ने बिगुल पुकारा॥
नाम रख लिया गर्व से भारी।
कॉकरोच जनता पार्टी प्यारी॥
ना रुकना ना झुकना जाने।
हक़ की बातें जग में ठाने॥
बिना घूस के काम ना होवे।
आम युवा रातों को रोवे॥
पेपर लीक की घोर अंधेरी।
न्याय करो ना लाओ देरी॥
अफ़सर नेता कान न धरते।
वादों की बस बातें करते॥
डिजिटल दुनिया में धूम मचाई।
‘दस मिलियन’ की फ़ौज बनाई॥
फॉलोअर्स में सबको पछाड़ा।
विरोध का नया झंडा गाड़ा॥
मैनिफेस्टो ऐसा अनोखा।
दूर करे जो हर इक धोखा॥
अंधेरे कोने में जो रहते।
अब वह अपनी बातें कहते॥
युवा शक्ति का रूप निराला।
व्यंग्य बाण सिस्टम पर डाला॥
बिना स्वार्थ यह सेना जागी।
अधिकारों की बनी अनुरागी॥
जो सोए हैं उन्हें जगाना।
सच्चाई का पाठ पढ़ाना॥
अन्याय के आगे कभी न झुकना।
जब तक न्याय न मिले न रुकना॥॥
दोहा
जो यह चालीसा पढ़े, समझे युवा की पीर।
सच्चा लोकतंत्र वही, जहाँ सुधरे सबकी तकदीर॥
बेरोजगार युवा की हनुमान चालीसा
॥ दोहा ॥
जय डिग्रीधर बलवीरा, बेरोजगार हनुमान।
फॉर्म भरत युग बीत गए, नौकरी का ना नाम॥
॥ चौपाई ॥
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर,
बेरोजगार युवा के नायक।
बीए एमए सब कर डाले,
चपरासी में भी ना पाले॥
कोचिंग की शरण में जावें,
बापू का पेंशन खा जावें।
सुबह शाम किताबें रटते,
पेपर लीक से क़िस्मत फटते॥
भर्ती निकले दस हजार,
आवेदन आए दस लाख पार।
दौड़ भाग में जूते घिसते,
मेरिट लिस्ट में नाम ना दिखते॥
सरकारी बाबू बनने चले,
कॉन्ट्रैक्ट पर सब धरे गए।
अग्निवीर का झुनझुना थमाया,
चार साल में घर को आया॥
माँ कहे बेटा कब कमाएगा,
बाप बोले कब ब्याह रचाएगा।
शर्मा जी का लड़का देखो,
कनाडा जा कर डॉलर फेंको॥
नेता आए वोट मांगने,
लैपटॉप बाँटे फोटो खिंचाने।
रोजगार का वादा करके,
पाँच साल फिर गायब होके॥
लाठी चार्ज के तुम हो साथी,
आंदोलन में खाते लाठी।
संसद घेरो तो देशद्रोही,
चुप बैठो तो भूखे सोई॥
संकट कटे मिटे सब पीरा,
जो सुमिरे बेरोजगार वीरा।
नौकरी पक्की कब वह पावे,
हनुमान-सी शक्ति जगावे॥
जो यह पढ़े चालीसा भाई,
सरकारी जॉब तुरंत पाई।
कह तिवारी अकेला राम,
युवा शक्ति को करो प्रणाम॥
॥ दोहा ॥
नौकरी बिन हनुमान से, बल बुद्धि सब व्यर्थ।
सिस्टम का लंका दहन, अब तो करो समर्थ॥
जब अंगार हृदय में जलते हैं
जब अंगार हृदय में जलते हैं
जब अंगार हृदय में जलते हैं,
तब अपने भी पीछे हटते हैं।
किससे कहें व्यथा इस दिल की,
यहाँ सब चेहरे बदलते हैं।
भीड़ बहुत है इस दुनिया में,
पर सब मतलबी राहें हैं।
जिसको माना अपना हमने,
उसने ही बदली निगाहें हैं।
आँसू भी अब सूख चुके हैं,
होंठों पर खामोशी छाई है।
अपनों के इस भरे शहर में,
बस यादों की तन्हाई है।
पर सीख लिया अब जीने का,
इन अंगारों को सहने का।
ख़ुद ही अपना मीत बनेंगे,
क्या फायदा किसी से कहने का।
तिवारी अकेला
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