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कवि जयपाल की कविताओं का विश्लेषण
समकालीन क्रूर-व्यवस्था पर व्यंग्य और मानवीय संवेदना की पक्षधर कविताएँ
कवि जयपाल की कविताओं का विश्लेषण
पुस्तक चर्चा—
समीक्षाकर्ता-मनजीत सिंह (९६७१५०४४०९)
पुस्तक-कविता भी तुम्हें देखती है
कवि: जयपाल (+९१ ९४६६६ १०५०८)
प्रकाशकः यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र (९०५०१ ८२१५६)
मूल्यः रु१९९ / – [पृष्ठः १५०]
समकालीन क्रूर-व्यवस्था पर व्यंग्य और मानवीय संवेदना की पक्षधर कविताएँ
जयपाल जी का कविता संग्रह “कविता भी तुम्हें देखती है” एक शानदार किताब है जिसकी पुस्तक समीक्षा एक विश्लेषण ढंग से करने की कोशिश की है। समकालीन हिन्दी साहित्य में व्यंग्य एक सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में उभरा है, जिसके माध्यम से कवि और लेखक समाज की विसंगतियों, विरोधाभासों और विडंबनाओं को उजागर करते हैं। आज का समाज बाहरी रूप से आधुनिक और विकसित दिखाई देता है, लेकिन भीतर से वह अनेक समस्याओं—जैसे अंधविश्वास, जातिवाद, धार्मिक कट्टरता और संवेदनहीनता—से ग्रस्त है। ऐसे समय में व्यंग्य केवल हँसाने का साधन नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करने वाला माध्यम बन जाता है। समकालीन कवि धर्म और जाति के नाम पर फैल रही नफ़रत पर तीखा प्रहार करते हैं। मनुष्य अपनी पहचान को लेकर इतना संकीर्ण हो गया है कि वह मानवता को भूल बैठता है। परिणामस्वरूप हिंसा, द्वेष और सामाजिक विभाजन बढ़ते हैं। व्यंग्य इन स्थितियों को उजागर कर पाठक को यह समझाने का प्रयास करता है कि सच्चा धर्म और मानवता प्रेम, सहिष्णुता और करुणा में निहित है। इसके साथ ही, व्यंग्य सत्ता, राजनीति और अंधभक्ति पर भी प्रश्न उठाता है। लोग अक्सर नेताओं और धर्मगुरुओं के प्रभाव में आकर अपनी स्वतंत्र सोच खो देते हैं। वे बिना सोचे-समझे उनका अनुसरण करते हैं, जिससे समाज में असमानता और अन्याय बढ़ता है। व्यंग्य इन प्रवृत्तियों को चुनौती देता है और जागरूकता फैलाने का कार्य करता है। मानवीय चेतना इस पूरे परिदृश्य में एक सकारात्मक शक्ति के रूप में सामने आती है। यह हमें संवेदनशील, न्यायप्रिय और सहानुभूतिशील बनने की प्रेरणा देती है। जब मनुष्य अपनी चेतना को जाग्रत करता है, तब वह सही और ग़लत में अंतर कर पाता है और समाज को बेहतर बनाने में योगदान देता है।
अच्छी बात नहीं है
अपने पड़ोसी को मार देना
यह बात मैं अच्छी तरह जानता था
मानता भी था
पर इन दिनों
मैं अपने धर्म और जाति पर
बहुत अधिक गर्व महसूस कर रहा था
गर्व की ऐसी गहरी अनुभूति
मुझे आज से पहले कभी महसूस नहीं हुई
गर्व करते-करते
एक दिन मेरा पड़ोसी मेरे ही हाथों मारा गया
भीड़ ने उसका घर जला दिया
शर्म नहीं आई!
माँ ने सवाल किया
शर्म किस बात की!
मैंने गर्व से कहा
कवि जयपाल समाज में फैल रही धर्म और जाति के अंधे गर्व की भावना पर व्यंग्य करता है। कवि कहता है कि वह अच्छी तरह जानता था कि अपने पड़ोसी को मारना ग़लत है, फिर भी इन दिनों उसे अपने धर्म और जाति पर बहुत अधिक गर्व होने लगा था। यह गर्व इतना बढ़ गया कि उसने अपनी मानवता और सही-गलत की समझ खो दी। इसी अंधे गर्व के कारण एक दिन उसने अपने ही पड़ोसी की हत्या कर दी और भीड़ ने उसका घर भी जला दिया। जब उसकी माँ उससे पूछती है कि क्या उसे शर्म नहीं आई, तो वह उल्टा गर्व से जवाब देता है। इससे स्पष्ट होता है कि धर्म और जाति के नाम पर पैदा हुआ घमंड मनुष्य को इतना अंधा बना देता है कि वह हिंसा जैसे ग़लत काम को भी सही समझने लगता है और उसे शर्म भी महसूस नहीं होती। कवि यह बताना चाहता है कि धर्म और जाति का अंधा गर्व मानवता के लिए बहुत खतरनाक है, क्योंकि इससे मनुष्य की संवेदना और नैतिकता समाप्त हो जाती है
हम धर
सिर पर उठाकर घूमते रहे
धर्म-गुरुओं के चरण धोते रहे
राजाओं के लिए युद्ध लड़ते रहे
शहीद होते रहे और सम्मान पाते रहे
बस इस तरह हम मरे
अमर हुए
कवि जयपाल समाज की उस मानसिकता पर व्यंग्य करता है, जिसमें आम लोग शक्तिशाली लोगों के लिए अपना जीवन बलिदान कर देते हैं। लेखक कहता है कि हम लोग तानाशाहों और शासकों को अपने सिर पर बिठाकर उनका सम्मान करते रहे। हम धर्म-गुरुओं के चरण धोते रहे और राजाओं के लिए युद्ध लड़ते रहे। इन युद्धों में हम शहीद भी होते रहे और हमें सम्मान भी मिलता रहा। लेकिन वास्तव में इन सबका लाभ आम लोगों को नहीं, बल्कि राजाओं और तानाशाहों को मिलता है। हमारे मरने से वे और अधिक शक्तिशाली और प्रसिद्ध हो जाते हैं। इसी कारण लेखक व्यंग्य करते हुए कहता है कि हम तो मर गए, लेकिन तानाशाह अमर हो गए। आम लोगों को अंधभक्ति में पड़कर शासकों या धर्म-गुरुओं के लिए अपने प्राण नहीं देने चाहिए, बल्कि समझदारी से सोचना चाहिए।
मजदूर…
पेड़ के बीज में छिपा होता है
बन जाता है जड़, तना और पत्ते
महक जाता है फूल की तरह
पक जाता है फल की तरह
मिट्टी में उगता है
पलता है खेत में
बनता है फ़सल
दाने में ढलता है
पानी में रहता है
वाष्प में उड़ता है
बरसता है
बारिश में
नदी में बहता है
पृथ्वी-सा घूमता है
सूरज-सा तपता है
चमकता है चांद-सा
तारे-सा दमकता है
कवि ने मज़दूर के महत्त्व और उसके परिश्रम को सुंदर रूपकों के माध्यम से बताया है। कवि कहता है कि मज़दूर उस बीज की तरह होता है, जो पेड़ बनकर जड़, तना और पत्तों का रूप लेता है। उसी के परिश्रम से फूलों की सुगंध और फलों की मिठास संभव होती है। इसी प्रकार मज़दूर मिट्टी में काम करता है, खेतों में मेहनत करता है और उसी की मेहनत से फ़सल तैयार होती है तथा दाने पैदा होते हैं। इसका अर्थ है कि हमारी रोज़मर्रा की ज़रूरतों की हर चीज़ के पीछे मज़दूर का परिश्रम छिपा होता है। कवि आगे बताता है कि मज़दूर पानी की तरह हर जगह मौजूद होता है—कभी वाष्प बनकर उड़ता है, कभी बारिश बनकर बरसता है और कभी नदी बनकर बहता है। यानी उसका श्रम हर क्षेत्र में दिखाई देता है। कवि मज़दूर की तुलना पृथ्वी, सूरज, चाँद और तारों से करता है। वह पृथ्वी की तरह लगातार काम करता है, सूरज की तरह तपता है और चाँद-तारों की तरह जगमगाता है कवि यह बताना चाहता है कि मज़दूर का श्रम बहुत महान और महत्त्वपूर्ण है। उसी के परिश्रम से दुनिया चलती है और समाज का विकास संभव होता है। कवि इस कविता में उपमा अलंकार का प्रयोग करता है। कवि ने “ईश्वर कहाँ रहता है” कविता के माध्यम से समाज में फैल रही धार्मिक कट्टरता और हिंसा पर तीखा व्यंग्य किया है। शुरुआत में कहा गया है कि सब लोग कहते हैं कि ईश्वर हर जगह रहता है, लेकिन वास्तव में लोग यह नहीं जानते कि वह कहाँ है। इसके बाद कवि व्यंग्यात्मक ढंग से बताता है कि कुछ लोग ईश्वर को पाने के नाम पर खून-खराबा, बस्तियों को जलाना, घरों पर बुलडोज़र चलाना और देशों को तबाह करना जैसी हिंसक गतिविधियाँ करते हैं। वे सोचते हैं कि ऐसा करके वे अपने धर्म की रक्षा कर रहे हैं और ईश्वर को पा लेंगे। कवि का आशय यह है कि जब लोग धर्म के नाम पर नफरत, हिंसा और विनाश फैलाते हैं, तो वे वास्तव में ईश्वर के सच्चे संदेश से दूर हो जाते हैं। इस कविता के माध्यम से कवि यह संदेश देना चाहता है कि ईश्वर को पाने का रास्ता हिंसा और विनाश नहीं, बल्कि प्रेम, मानवता और शांति है।
कामरेड की गठरी
ज्ञान की गठरी का पहाड़ जिसे न कभी मार्क्स ने सिर पर उठाया न लेनिन और न एंगेल्स ने उसे उठाए घूम रहे हैं कुछ कामरेड
कामरेड का संदूक
ज्ञान के तालाबंद संदूक को अपने सिर पर लाद कर चलने वाले कामरेडो
एक बार संदूक ज़मीन पर उतार कर भी देख लो थोड़ी बहुत हवा भी ज़रूरी है सिर और संदूक दोनों के लिए

कवि ने कुछ लोगों की दिखावटी विद्वता और कट्टर विचारधारा पर व्यंग्य किया है। लेखक कहता है कि कुछ कामरेड (कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक) ज्ञान की ऐसी भारी गठरी सिर पर उठाकर घूम रहे हैं, जिसे स्वयं मार्क्स, लेनिन और एंगेल्स जैसे महान विचारकों ने भी इस तरह नहीं उठाया था। इसका अर्थ है कि ये लोग उनके विचारों को समझने के बजाय केवल उनका बोझ ढोते रहते हैं और ख़ुद को बहुत बड़ा ज्ञानी समझते हैं। आगे कवि संदूक (बक्से) का उदाहरण देता है। वह कहता है कि कुछ कामरेड ज्ञान के तालाबंद संदूक को अपने सिर पर लादकर चलते रहते हैं। यानी उनका ज्ञान बंद और कठोर है, उसमें नए विचारों या ताज़ी हवा के लिए जगह नहीं है। इसलिए लेखक सलाह देता है कि वे एक बार उस संदूक को ज़मीन पर उतारकर देखें। इससे उनके सिर को भी राहत मिलेगी और उस बंद संदूक को भी थोड़ी हवा (नए विचार और खुलापन) मिल जाएगा। कवि यह संदेश देना चाहता है कि किसी भी विचारधारा को अंधे और कठोर तरीके से ढोने के बजाय खुलकर, समझदारी से और नए विचारों के साथ अपनाना चाहिए।
डरो मत
करोना से मत डरो
पूँजी पति चैरिटी कर रहे हैं
देवता चमत्कार कर रहे हैं
ऋषि मुनि वरदान दे रहे हैं
मंदिर-मस्जिद मन्नतें पूरी कर रहे हैं
चमत्कारी बाबा कृपा कर रहे हैं
चिंता मत करो
देश चल रहा है
सरकार चल रही है
करोना भी चल रहा है
तुम भी चलते रहो!
कवि ने कोरोना महामारी के समय की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पर व्यंग्य किया है। लेखक कहता है कि लोगों से कहा जा रहा है कि वे कोरोना से डरें नहीं, क्योंकि पूँजीपति लोग चैरिटी कर रहे हैं, देवता चमत्कार कर रहे हैं, ऋषि-मुनि वरदान दे रहे हैं, मंदिर-मस्जिद मन्नतें पूरी कर रहे हैं और चमत्कारी बाबा कृपा कर रहे हैं। कवि यह दिखाना चाहता है कि संकट के समय में वास्तविक समाधान खोजने के बजाय लोग अंधविश्वास, दिखावे और धार्मिक चमत्कारों पर भरोसा करने लगते हैं। कवि कहता है कि चिंता मत करो—देश भी चल रहा है, सरकार भी चल रही है और कोरोना भी चल रहा है, इसलिए तुम भी चलते रहो। यहाँ लेखक का आशय है कि समस्या के बावजूद व्यवस्था अपने तरीके से चलती रहती है, लेकिन आम लोगों की कठिनाइयों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। कवि समाज में फैले अंधविश्वास, दिखावटी मदद और व्यवस्था की उदासीनता पर व्यंग्य करता है और लोगों को सचेत होने का संदेश देता है।
स्मृति शेषः डा. महावीर नरवाल
जेल में बेटी
मरने से पहले
एक पिता एक बेटी से अंतिम बात करना चाहता है एक बेटी एक पिता से अंतिम बात करना चाहती है
इस अंतिम इच्छा मात्र से
जिस महान लोकतंत्र की दीवारें हिलने लगती हों
जो दीवारें मानवीय संवेदनाओं के क़त्ल पर टिकी हों
ऐसी दीवारों का गिर जाना ही अच्छा है
जितनी जल्दी गिर जाएँ उतना ही बेहतर
ताकि दुनिया भर की बेटियाँ जिससे चाहें उससे बात कर सकें पहचान कर सकें उस हत्यारे की
जो छिपा है उन दीवारों के पीछे
कवि ने एक पिता और बेटी के बीच की मानवीय संवेदना तथा लोकतंत्र की वास्तविक स्थिति पर गहरा व्यंग्य किया है। कवि बताता है कि एक पिता मरने से पहले अपनी बेटी से अंतिम बार बात करना चाहता है और बेटी भी अपने पिता से अंतिम बात करना चाहती है। यह एक बहुत साधारण और मानवीय इच्छा है। लेकिन यदि केवल इस छोटी-सी इच्छा से ही किसी महान लोकतंत्र की दीवारें हिलने लगती हों, तो इसका अर्थ है कि उस लोकतंत्र की नींव मानवीय संवेदनाओं के दमन पर टिकी हुई है। कवि आगे कहता है कि यदि ऐसी कठोर और अमानवीय दीवारें हैं, जो लोगों को अपने प्रियजनों से मिलने या बात करने से भी रोकती हैं, तो उनका गिर जाना ही बेहतर है। वे जितनी जल्दी गिर जाएँ, उतना अच्छा है। कवि कहता है कि जब ये दीवारें गिरेंगी, तब दुनिया की बेटियाँ स्वतंत्र रूप से जिससे चाहें उससे बात कर सकेंगी और उन लोगों को पहचान सकेंगी, जो इन अमानवीय दीवारों के पीछे छिपे हुए असली दोषी हैं।
कवि मानवीय संवेदना, स्वतंत्रता और न्याय की आवश्यकता को व्यक्त करता है तथा उन व्यवस्थाओं की आलोचना करता है जो मनुष्यता को दबाती हैं।
कविता की तरह
माँ अनपढ़ है न कविता लिख सकती है न पढ़ सकती है न समझ सकती है पर माँ को लिखा जा सकता है पढ़ा जा सकता है समझा जा सकता है कविता की तरह
बची हुई कविता
कविता बचाते-बचाते भले ही वे बच न सके पर वे बचा सके दुनिया जिसमें बची रही कविता बची हुई कविता ही बची हुई दुनिया है वे कहते थे। कवि ने माँ और कविता के गहरे सम्बंध तथा कविता के महत्त्व को भावपूर्ण ढंग से व्यक्त किया है। कवि कहता है कि माँ अनपढ़ है—वह न कविता लिख सकती है, न पढ़ सकती है और न ही समझ सकती है। लेकिन फिर भी माँ को कविता की तरह महसूस, पढ़ा और समझा जा सकता है। इसका अर्थ है कि माँ का प्रेम, त्याग और स्नेह इतना गहरा और सुंदर होता है कि वह किसी कविता से कम नहीं होता। माँ स्वयं एक जीवंत कविता है। कवि कविता के महत्त्व को बताता है। वह कहता है कि कुछ लोग कविता को बचाने की कोशिश करते-करते शायद स्वयं तो नहीं बच सके, लेकिन उन्होंने एक ऐसी दुनिया बचा ली जिसमें कविता जीवित रही। कवि कहता है कि बची हुई कविता ही बची हुई दुनिया है। इसका अर्थ है कि जब तक कविता (अर्थात् संवेदनाएँ, भावनाएँ और मानवीयता) जीवित हैं, तब तक दुनिया भी जीवित और सुंदर बनी रहेगी। माँ प्रेम और संवेदना की प्रतीक है और कविता मानवता की आत्मा है—इनके बिना जीवन अधूरा है।
ज़िंदगी का सूरज
खिलखिलाते खेलते बच्चे
हवा, धूप, छाँव, रिमझिम-फुहार, बारिश के साथ
दाना दाना होते पिता
गेहूँ, धान, मकई, ज्वार, बाजरा, सरसों के साथ
पानी पानी होती माँएँ
कुएँ, बावड़ी, तालाब, नदी-नहरों के साथ
सपने सजाती लड़कियाँ
किताबों, कापियों, चिड़ियों, घोंसलों, पेड़ों और हवाओं के साथ
धरती पर उग रहा है ज़िंदगी का सूरज!
कवि ने जीवन की सुंदरता, श्रम और आशा का अत्यंत भावपूर्ण चित्र प्रस्तुत किया है। कवि सबसे पहले खिलखिलाते और खेलते बच्चों का वर्णन करता है, जो हवा, धूप, छाँव और बारिश के साथ प्रकृति में आनंद लेते हैं। यह जीवन की मासूमियत और ख़ुशी का प्रतीक है। इसके बाद कवि पिता को दिखाता है, जो खेतों में मेहनत करते हुए गेहूँ, धान, मकई, ज्वार, बाजरा और सरसों उगाते हैं। “दाना-दाना होते पिता” का अर्थ है कि पिता अपने श्रम से परिवार के लिए अन्न जुटाते हैं और अपना जीवन उसी में लगा देते हैं। फिर कवि माँ का वर्णन करता है, जो “पानी-पानी होती” हैं—अर्थात वे पानी की तरह निरंतर बहती हुई, परिश्रम करती हुई परिवार और जीवन को सींचती हैं। उनका सम्बंध कुएँ, बावड़ी, तालाब और नदियों से जोड़ा गया है, जो जीवनदायिनी हैं। आगे कवि लड़कियों को दिखाता है, जो किताबों, कॉपियों, चिड़ियों, घोंसलों, पेड़ों और हवाओं के साथ अपने सपने सजाती हैं। यह उनके सपनों, स्वतंत्रता और भविष्य की आशाओं का प्रतीक है। कवि कहता है कि इन सभी के बीच धरती पर “ज़िंदगी का सूरज” उग रहा है। इसका अर्थ है कि जीवन में आशा, ऊर्जा और नई शुरुआत हो रही है। कवि यह संदेश देना चाहता है कि बच्चों की खुशी, माता-पिता का परिश्रम और लड़कियों के सपने—इन सबके मेल से ही जीवन सुंदर बनता है और यही जीवन की असली रोशनी है।
चिड़ियाघर
कोई तो बात होगी
कि जहाँ रहते हैं
स्वभाव से चुलबुली रंग-बिरंगी सुंदर चिड़िया भला किसको नहीं भाएगी शेर / चीते / बाघ / हाथी / घोड़े / जहरीले सांप / खुंखार जानवर उस जगह का नाम रखा गया चिड़ियाघर जैसे आधुनिक राष्ट्रों को कहा गया गणतंत्र
चिड़िया कभी नहीं समझ पाएगी किसने उसका नाम रखा चिड़ियाघर और वज़ह क्या थी
चिड़िया तो बेचारी प्रजा है
कवि ने समाज और राजनीतिक व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य किया है। कवि कहता है कि चिड़ियाघर में कई प्रकार के जानवर होते हैं—शेर, चीता, बाघ, हाथी, घोड़े, जहरीले साँप और अन्य खूँखार जीव। फिर भी उस स्थान का नाम “चिड़ियाघर” रखा गया है, जबकि चिड़िया तो स्वभाव से चुलबुली, रंग-बिरंगी और सुंदर होती है। इस उदाहरण के माध्यम से कवि यह दिखाना चाहता है कि अक्सर किसी जगह या व्यवस्था का नाम उसके वास्तविक स्वरूप से मेल नहीं खाता। जैसे आधुनिक राष्ट्रों को “गणतंत्र” कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि सत्ता जनता के हाथ में है, लेकिन वास्तविकता में शक्ति कुछ लोगों (खूँखार जानवरों के प्रतीक) के पास होती है। कवि आगे कहता है कि चिड़िया (जो आम जनता का प्रतीक है) कभी नहीं समझ पाएगी कि इस जगह का नाम “चिड़ियाघर” क्यों रखा गया। वह तो बेचारी प्रजा है, जिसे न तो सही जानकारी दी जाती है और न ही निर्णय लेने का अधिकार होता। इस रचना के माध्यम से यह बताना चाहता है कि समाज और राजनीति में कई बार नाम और वास्तविकता में बड़ा अंतर होता है और आम जनता अक्सर इस सच्चाई से अनजान रहती है।
अंत में मैं यही कहना चाहता हूँ कि समकालीन हिन्दी कविता में सामाजिक यथार्थ, राजनीतिक विडंबनाएँ और मानवीय संवेदनाएँ प्रमुख विषय के रूप में उभरकर सामने आए हैं। कवि जयपाल की कविताएँ इसी परंपरा की प्रतिनिधि रचनाएँ हैं, जिनमें व्यंग्य के माध्यम से समाज की विसंगतियों को उजागर किया गया है। उनकी कविताएँ न केवल वर्तमान समय की सच्चाइयों को सामने लाती हैं, बल्कि पाठक को आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित करती हैं।
कवि जयपाल विशेष रूप से धर्म और जाति के नाम पर फैल रही अंधभक्ति और घमंड पर तीखा प्रहार करते हैं। उनकी कविता में एक व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि वह जानता था कि अपने पड़ोसी की हत्या करना ग़लत है, फिर भी धर्म और जाति के अंधे गर्व में उसने यह अमानवीय कार्य कर दिया। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि जब मनुष्य पर सामूहिक उन्माद और संकीर्ण पहचान हावी हो जाती है, तो उसकी नैतिकता और विवेक समाप्त हो जाते हैं। कवि इस स्थिति को अत्यंत खतरनाक मानते हैं, क्योंकि यह मानवता के मूल स्वरूप को ही नष्ट कर देती है। इसी प्रकार, कवि समाज में व्याप्त अंधभक्ति और सत्ता के प्रति समर्पण की प्रवृत्ति पर भी व्यंग्य करते हैं। लोग धर्मगुरुओं और शासकों को पूजते हैं, उनके लिए युद्ध लड़ते हैं और अपने प्राण तक न्योछावर कर देते हैं। लेकिन इन सबका वास्तविक लाभ शासक वर्ग को ही प्राप्त होता है, जबकि आम जनता केवल साधन बनकर रह जाती है। कवि इस विडंबना को उजागर करते हुए लोगों को जागरूक होने का संदेश देते हैं।
कवि जयपाल की कविताओं में मज़दूर वर्ग के महत्त्व को भी अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। मज़दूर को बीज, पृथ्वी, पानी और सूर्य जैसे प्राकृतिक तत्वों से जोड़कर कवि यह दर्शाते हैं कि समाज की समस्त संरचना उसके श्रम पर आधारित है। यह दृष्टिकोण श्रम के सम्मान और उसकी अनिवार्यता को रेखांकित करता है। धार्मिक कट्टरता और अंधविश्वास पर भी कवि ने गहरा व्यंग्य किया है। “ईश्वर कहाँ रहता है” जैसी कविताओं में वे यह स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर के नाम पर की जाने वाली हिंसा और विनाश वास्तविक आस्था नहीं, बल्कि उसकी विकृति है। इसी क्रम में कोरोना महामारी के संदर्भ में कवि ने दिखाया है कि संकट के समय भी लोग तर्क और विज्ञान के बजाय चमत्कारों और अंधविश्वासों पर निर्भर हो जाते हैं।
कवि ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की संवेदनहीनता पर भी प्रश्न उठाए हैं, जहाँ एक पिता और बेटी की अंतिम बातचीत जैसी साधारण मानवीय इच्छा भी पूरी नहीं हो पाती। यह स्थिति व्यवस्था की कठोरता और अमानवीयता को उजागर करती है। अंततः, कवि जयपाल की कविताएँ केवल आलोचना तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे जीवन की सकारात्मक शक्तियों—माँ के प्रेम, बच्चों की निष्कलुषता, लड़कियों के सपनों और मज़दूर के श्रम—को भी उजागर करती हैं। इस प्रकार उनकी कविताएँ समाज को एक ओर उसकी कमियों से अवगत कराती हैं और दूसरी ओर मानवता, संवेदना और आशा की राह भी दिखाती हैं। जयपाल जी को इस किताब के लिए बहुत-बहुत बधाई और साथ ही यूनिक पब्लिकेशन कुरुक्षेत्र को भी साधुवाद!
समीक्षा—मनजीत सिंह
उर्दू विभाग कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र
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